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लंदन के भोजपुरी कवि : शशि सिंह
लंदन के भोजपुरी कवि : शशि सिंह
Wednesday, 06-December-2006 | 20:38
This article has been originally published in http://www.littichokha.com भोजपुरी के युवा पीढ़ी में मनोज भावुक एगो चर्चित नाम बा। भोजपुरी साहित्य, सिनेमा,रंगमंच ,भोजपुरी इंटरनेट आ देश-विदेश मे भोजपुरी के प्रचार-प्रसार… कहीं भी नज़र डालीं, मनोज भावुक कवनो ना कवनो रूप मे सक्रिय आ सार्थक प्रयास करत मिलिहें। पटना प्रवास के दौरान ( सन ई0 - 1993-2000) बिहार आर्ट थियेटर ,कालिदास रंगालय से जुड़ के भोजपुरी नाटकन के मंचन के अइसन अभियान चलवलें कि उहाँ भोजपुरी नाट्य महोत्सव होखे लागल ।
 
गोरिया के लव-लेटर : मनोज भावुक
गोरिया के लव-लेटर : मनोज भावुक
Wednesday, 06-December-2006 | 20:30

 
संस्कृति : मनोज भावुक
संस्कृति : मनोज भावुक
Wednesday, 06-December-2006 | 20:24
मनोज भावुक के नाव भोजपुरिहा लोगन खातिर अपरिचित नइखे, संस्कृति कविता के माध्यम से मनोज जी हमरे भोजपुरी समाज के वर्तमान स्थिति पर एगो गम्भीर कटाक्ष कइले बानी । आईं पढीं आ एकरे बारे में शोचीं ...
 
अथातो घुमक्कड़ - जिज्ञासा : राहुल सांकृत्यायन
अथातो घुमक्कड़ - जिज्ञासा : राहुल सांकृत्यायन
Wednesday, 06-December-2006 | 08:41
राहुल सांकृत्यायन हिन्दी साहित्य की अद्वितीय विभूति, महान उपासक तथा बहुमुखी सेवक है। आपका साहित्य सृजन विराट था। आप हिन्दी साहित्य के एक समर्थ साहित्यकार है। प्रस्तुत रचना यू.पी. बोर्ड से इण्टर पास करने वाले लोगों ने गद्यगरिमा किताब में जरूर पढी होगी । आइये, इसे दोबारा पढें....
 
डॉ. राम दरश मिश्र की कविता
तुम बिन : डॉ० रामदरश मिश्र
Wednesday, 06-December-2006 | 08:33
हिन्दी साहित्य के प्रख्यात लेखक और कवि डॉ. राम दरश मिश्र हमारे प्रिय भोजपुरी कवि पं. राम नवल के भाई हैं और चौरीचौरा के पास ही बिशुनपुरा गाँव के मूल निवासी हैं । वर्तमान में दिल्ली में रहकर हिन्दी जगत की सेवा कर रहे हैं । प्रस्तुत कविता हिन्दी के 100 श्रेष्ठ प्रेम गीतों में एक है ।
 
संस्कृत भाषा के रहस्य
संस्कृत भाषा के रहस्य: शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
Wednesday, 06-December-2006 | 04:12
सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। इतना सब होने के बाद भी बहुत कम लोग ही जानते है कि संस्कृत भाषा अन्य भाषाओ की तरह केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र ही नहीं है; अपितु वह मनुष्य के सर्वाधिक संपूर्ण विकास की कुंजी भी है। इस रहस्य को जानने वाले मनीषियों ने प्राचीन काल से ही संस्कृत को देव भाषा और अम्रतवाणी के नाम से परिभाषित किया है। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है
 
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